मोहम्मद यूनुस बने बांग्लादेश की अंतिरम सरकार के प्रमुख सलाहकार

मोहम्मद यूनुस बने बांग्लादेश की अंतिरम सरकार के प्रमुख सलाहकार

बांग्लादेश के प्रधानमंत्री पद से शेख़ हसीना के इस्तीफ़ा देने के बाद नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस को अंतरिम सरकार का प्रमुख सलाहकार नियुक्त कर दिया गया है. 84 वर्षीय अर्थशास्त्री यूनुस को प्रमुख नियुक्त करने का प्रस्ताव प्रदर्शन कर रहे छात्र नेताओं ने रखा था. हालांकि, ये विरोध प्रदर्शन बाद में हिंसा में बदल गया और इसमें 100 से ज़्यादा लोगों की जान चली गई.ऐसे में चर्चा हो रही है कि आख़िर वह अनुभवी सामाजिक उद्यमी कौन है, जिसे व्यापक रूप से बांग्लादेशी लोकतंत्र को व्यवस्थित करने और स्थिर करने के प्रयासों का नेतृत्व करने के लिए कहा गया है?

कौन है मोहम्मद यूनुस ?

मोहम्मद यूनुस को 1970 के दशक में माइक्रोफ़ाइनेंस के अग्रणी के रूप में जाना जाने लगा और इससे देश के सबसे ग़रीब लोगों को ग़रीबी से बाहर निकालने में मदद मिली. यूनुस को इन सबकी प्रेरणा चटगांव यूनिवर्सिटी के नज़दीक एक ग़रीब गांव की यात्रा करने से मिली. उन्होंने कई दर्जन ग्रामीणों को शुरुआत में दस डॉलर उधार दिए. यूनुस ने इस दौरान उन छोटे उद्यमियों को उधार दिए जिन्हें बैंक आमतौर पर पैसे नहीं देते थे. 1980 के दशक के शुरुआती सालों में प्रोफ़ेसर यूनुस सफल रहे और बाद में ग्रामीण बैंक की स्थापना हुई. इस बैंक में सदस्य के तौर पर हज़ारों लोग जुड़े. बैंक ने बांग्लादेश में लाभदायक और गैर लाभकारी दोनों तरह के प्रोजेक्ट शुरू किए. इसमें कपड़े से लेकर मोबाइल और ब्रॉडबैंड सेवा तक शामिल थी.

इसके बाद यूनुस ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और उन्हें उनके काम के लिए 2006 में नोबेल पुरस्कार मिला. यूनुस के इस मॉडल को कई विकासशील देशों ने अपनाया. नोबेल मिलने के कुछ महीने बाद ही यूनुस राजनीति को लेकर कमेंट करने लगे. उन्होंने कहा, ”मैं वो शख्स नहीं हूं जो कि राजनीति को लेकर सहज होऊं, लेकिन अगर हालात मजबूर करते हैं तो मैं राजनीति में शामिल होने से नहीं हिचकिचाऊंगा.” साल 2007 में नागोरिक शक्ति (नागरिकों की शक्ति) यूनुस ने इस मक़सद से शुरू किया था कि शेख़ हसीना और ख़ालिदा ज़िया की पार्टी के अलावा लोगों के सामने तीसरे दल का विकल्प पेश किया जाए, लेकिन सत्ता संघर्ष और प्रतिद्वंद्विता से मोहभंग होने के बाद यूनुस ने राजनीति को अलविदा कह दिया.

मोहम्मद यूनुस ने एएफ़पी से कहा था कि ‘मैं कोई राजनीतिक व्यक्ति नहीं हूं. इस कारण मैंने तुरंत घोषणा की कि मैं कोई राजनीतिक पार्टी नहीं बनाने जा रहा हूं.’ इसके बाद के सालों में यूनुस सरकार के आलोचक बनते गए. साल 2008 में सत्ता में आने वाली शेख़ हसीना ने यूनुस पर आरोप लगाया कि वो अपनी व्यापारिक गतिविधियों से ग़रीब लोगों का ‘खून चूस रहे हैं.’

यूनुस के ख़िलाफ़ कई मामलों को लेकर जांच करवाई, लेकिन उनके समर्थकों ने कहा कि ये सब राजनीतिक बदले की भावना के तहत हो रहा है. पिछले साल संयुक्त राष्ट्र संघ ने बांग्लादेश में शेख़ हसीना के राजनीतिक विरोधी लोगों के साथ हो रहे व्यवहार को लेकर सरकार की निंदा की.

यूएन हाई कमीशन फॉर ह्यूमन राइट्स की प्रवक्ता रवीना शामदासानी ने कहा, “हम नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस सहित अन्य मानवाधिकार एडवोकेट को मिल रही निरंतर धमकी और उत्पीड़न से काफ़ी चिंतित हैं.” इसके बाद भी ये नहीं थमा और बांग्लादेश के सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल जुलाई में चैरिटेबल दान पर प्रोफेसर यूनुस को एक मिलियन डॉलर से ज़्यादा टैक्स देने का आदेश दिया. फिर जनवरी में यूनुस सहित ग्रामीण बैंक के अन्य तीन कर्मचारियों को श्रम क़ानूनों के उल्लंघन करने के मामले में छह महीने जेल की सज़ा सुनाई गई थी. चारों ने आरोपों से इनकार किया और अपील लंबित रहने तक सभी को ज़मानत मिली हुई है.

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