मुस्लिम महिला अधिनियम 1986 क्या है ? जानिए इसका इतिहास

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नई दिल्ली।  बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं के हक में पति से गुजारा भत्ता की मांग को लेकर ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोट की जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने यह फैसला सुनाया हैं। सीआरपीसी की धारा 125 के तहत मुस्लिम तलाकशुदा महिलाएं भी अब अपने पति से गुजारा भत्ता की मांग कर सकती हैं। बता दें कि यह मामला तब उत्पन्न हुआ जब एक मुस्लिम व्यक्ति ने पूर्व पत्नी को गुजारा भत्ता देने के तेलंगाना उच्च न्यायालय के निर्देश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। 

इतिहास 

शाह बानो मामला (1985): इस अधिनियम के बनने के पीछे सबसे महत्वपूर्ण घटना शाह बानो बेगम का मामला था। 62 वर्षीय शाह बानो बेगम ने अपने पति मोहम्मद अहमद खान से तलाक के बाद गुजारा भत्ता (maintenance) की मांग की थी। सुप्रीम कोर्ट ने 1985 में उनके पक्ष में फैसला सुनाया, जिससे उन्हें गुजारा भत्ता मिला।

मुस्लिम महिला अधिनियम क्या है?

मुस्लिम महिला (तलाक अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986 (Muslim Women (Protection of Rights on Divorce) Act, 1986) भारत में मुस्लिम महिलाओं के तलाक के बाद उनके अधिकारों और भरण-पोषण के प्रावधान करने के लिए लागू किया गया था। इस अधिनियम का उद्देश्य मुस्लिम महिलाओं को तलाक के बाद उनके अधिकारों की सुरक्षा करना है।

अधिनियम के प्रमुख प्रावधान

  1. इद्दत के दौरान गुजारा भत्ता:
    • तलाकशुदा मुस्लिम महिला को इद्दत की अवधि के दौरान उसके पूर्व पति से उचित और न्यायोचित गुजारा भत्ता पाने का अधिकार होता है।
    • इद्दत की अवधि तलाक के बाद की वह अवधि होती है, जो इस्लामी कानून के अनुसार महिला के लिए अनिवार्य होती है। यह अवधि आमतौर पर तीन महीने होती है।
  2. मेहर (महर) का भुगतान:
    • तलाकशुदा मुस्लिम महिला को उसके पति द्वारा निर्धारित मेहर की पूरी राशि का भुगतान करना होता है, यदि तलाक के समय यह अभी तक नहीं चुकाया गया है।
  3. बच्चों का भरण-पोषण:
    • तलाकशुदा मुस्लिम महिला को अपने बच्चों का भरण-पोषण करने का भी अधिकार है। यदि बच्चे उसके पास रहते हैं, तो पति को बच्चों की देखभाल और शिक्षा के लिए उचित धनराशि का भुगतान करना होता है।
  4. इद्दत के बाद का भरण-पोषण:
    • यदि तलाकशुदा महिला इद्दत की अवधि के बाद भी अपनी जीविका नहीं चला सकती है, तो उसका भरण-पोषण उसके रिश्तेदारों द्वारा किया जाना चाहिए। अगर रिश्तेदार सक्षम नहीं हैं, तो वक्फ बोर्ड द्वारा उसका भरण-पोषण किया जाएगा।

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